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देश की संवैधानिक व्यवस्था से जुड़ा एक महत्वपूर्ण मामला इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सर्वोच्च न्यायालय से 14 महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्नों पर स्पष्टीकरण मांगा है। यह मामला राज्यपाल और राष्ट्रपति के पास लंबित रहने वाले विधेयकों की मंजूरी प्रक्रिया तथा उनकी समय-सीमा से जुड़ा हुआ है।दरअसल, हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने तमिलनाडु सरकार और राज्यपाल के बीच विधेयकों को लेकर चल रहे विवाद में फैसला सुनाया था। अदालत ने कहा कि राज्यपाल किसी विधेयक को अनिश्चितकाल तक लंबित नहीं रख सकते। साथ ही, यदि कोई विधेयक राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है तो उस पर भी उचित समय के भीतर निर्णय लिया जाना चाहिए।इसी फैसले के बाद कई संवैधानिक और कानूनी प्रश्न सामने आए हैं। राष्ट्रपति ने सर्वोच्च न्यायालय से पूछा है कि संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल के अधिकार और कर्तव्य क्या हैं? क्या राज्यपाल मंत्रिपरिषद की सलाह मानने के लिए बाध्य हैं? क्या उनके निर्णय न्यायिक समीक्षा के दायरे में आते हैं? और क्या अनुच्छेद 361 राज्यपाल को पूर्ण संरक्षण प्रदान करता है?इसके अलावा राष्ट्रपति ने यह भी जानना चाहा है कि यदि कोई विधेयक पुनर्विचार के लिए वापस भेजा जाए और विधानसभा उसे दोबारा पारित कर दे, तो आगे की प्रक्रिया क्या होगी। साथ ही राष्ट्रपति और राज्यपाल की संवैधानिक शक्तियों की सीमाएं क्या हैं, इस पर भी स्पष्टता मांगी गई है।संवैधानिक विशेषज्ञों का मानना है कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इन प्रश्नों पर दिया जाने वाला जवाब भविष्य में राष्ट्रपति, राज्यपाल और राज्य सरकारों के बीच अधिकारों और जिम्मेदारियों को और अधिक स्पष्ट करेगा। इससे विधायी प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही भी बढ़ेगी।अब पूरे देश की नजर सर्वोच्च न्यायालय पर है, जहां इन 14 सवालों पर होने वाली सुनवाई और उसके फैसले का इंतजार किया जा रहा है।

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